जातिवाद की सच्चाई? | Casteism | Caste system in india | Caste in india

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जातिवाद की सच्चाई?

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    प्रश्न : जातिवाद की सच्चाई??? वर्ण व्यवस्था क्या है???

    जवाब :
    मेरे प्यारे देशवासियों,
    सबसे पहली बात हमारे देश में ही क्यों जातिवाद है?
    पूरे विश्व में क्यों हमारे जैसी चार (४) जातियां नहीं है?
    विश्व में दूसरे देशों में भी थोड़ा बहुत है, लेकिन जो हमारे देश में है शुद्र, वैश्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण वैसा का वैसा दूसरे देशों में भी क्यों नहीं है???

    जो अपने को नीचा या ऊंचा मानता हे, मेरे इस प्रश्न का उत्तर जरुर दें....

    मैं आपसे जानना चाहता हूं, की अगर यह जातियां भगवान ने बनाई है, तो फिर दूसरे देशों में यह क्यों नहीं हे?  क्या दूसरे देश हमारे भगवान को नहीं मानते इसलिए? वहां यह जातियां नहीं है, या तो फिर उन्होंने यह जातिवाद अपनाया ही नहीं है? या तो उनको इस जातिवाद के बारे में कुछ पता ही नहीं है?

    भाइयों और बहनों, सीधी बात है की जिन्होंने जो माना, वह वो बन गया, यह सब मान्यता का खेल है, दूसरे देशों ने ऐसी कोई चीज नहीं मानी, या तो वह कुछ अलग तरीके से मानते हैं, या तो उनकी मान्यताएं अलग है, ऐसा हो सकता है। लेकिन है तो मान्यता ना? दूसरे देशों में जातिवाद की समस्या उत्पन्न ही नहीं हुई क्योंकि वह यह मानते ही नहीं हे।

    दूसरी बात जाती ” जेसा कोई शब्द है ही नहीं। सही शब्द वर्ण ” है...

    मेरे मुताबिक जाती का मतलब होता है, स्त्री जाति या पुरुष जाति “ इसके अलावा कुछ नहीं।
    हमारे देश में वर्ण व्यवस्था थी। यह बात सही है, लेकिन इसका गलत मतलब निकाला गया और हमने यह मान भी लिया। इसलिए हम परेशान हैं, या तो जबरदस्ती थोपा गया।

    मनुस्मृति जैसे ग्रंथ में जाति जैसा कोई शब्द है ही नहीं!!! इस ग्रंथ में मिलावट करके लोगों ने गलत शलत भ्रम फैलाया है और लोगों को गलत मार्ग पर घसीटा गया है। यह जिसने भी किया हो इससे मतलब नहीं, आप खुद को क्या समझते हो? इससे मतलब है।

    वर्ण व्यवस्था तो आप जानते ही हो, की वर्ण के अनुसार क्या करना है, लेकिन यह नक्की कैसे होता है? कि किसका क्या वर्ण है?

    सबसे महत्वपूर्ण बात यही है, कि जन्म से कभी कोई वर्ण दिया नहीं जाता था। मतलब कि अगर आप ब्राह्मण के घर जन्मे हो तो आप ब्राह्मण ऐसा नहीं था और नहीं होना चाहिए क्योंकि?

    अगर ऐसा होता तो रावण तो ब्राह्मण के घर जन्मा था, उसे तो राक्षस कहा गया,
    विश्वामित्र क्षत्रिय के घर जन्मे थे, उनको ब्राह्मण कहा गया,
    ऐसे कई उदाहरण भरे पड़े हैं शास्त्रों पुराणों में उसका क्या मतलब है???


    प्रश्न : वर्ण देने का सही तरीका क्या है???

    जब बच्चा जन्म लेता है, तो उसको गुरुकुल में भेजा जाता था और वह वहां से वर्ण लेकर समाज में जाता था। वहां जो गुरु थे, वह बच्चे के गुण देखते थे, जैसे किसी किसी में क्षत्रिय के गुण हो तो उसे क्षत्रिय, शुद्र के गुण हो तो उसे शुद्र कहा जाता था।

    इसमें कोई नीचा ऊंचा नहीं है, जैसे हम बड़े बेटे को बड़ा और छोटे बेटे को छोटा कहते हैं, इससे उन दोनों बेटों में कोई भेदभाव नहीं है, मगर कहा जाता है कि जिसने पहले जन्म लिया वह बड़ा और जिसने बाद में जन्म लिया वह छोटा है। इसमें कोई उच नीच कुछ नहीं है। जो जैसे कार्य कर सके उसको वैसा वर्ण का कहा जाता था।

    इसका प्रमाण इसी वर्ण नाम के शब्द में है, वर्ण का अर्थ है रंग “ मतलब स्वभाव ” तो जन्म से कभी कोई उत्तम नहीं, मगर उसके गुण और कर्म से ही वह उत्तम बनता है।

    आप इसे समझे कि बच्चा पढ़ने जाता है, अब डॉक्टर का बेटा हो तो उसे डॉक्टर थोड़ी कहते हैं? उसमें वह योग्यता भी होनी चाहिए। या तो उसे वह हासिल करनी पड़ेगी। वैसे ही इंजीनियर का बेटा इंजीनियर नहीं कहा जाता।

    तो मेरे भाइयों हमारे बच्चे में क्या योग्यता है? वह पाठशाला, यूनिवर्सिटी के लोग उनकी परीक्षा लेकर प्रमाण पत्र देते हैं, कि भाई तुम इतने में हो, तुम विज्ञान से प्रमाणित हो, या तो तुम कॉमर्स से प्रमाणित हो, या तो आर्ट से प्रमाणित हो,

    इस बात मे आप लोग विवाद नहीं करते और प्यार से मान भी लेते हो। कि नहीं मैं डॉक्टर हूं तो मेरे बेटे को डॉक्टर ही कहो? मगर अगर वर्ण की बात आती है तो आपको मानने में परेशानी हो जाती हे और आप लोग भड़क जाते हो....

    अगर कोई माटी की चीज वस्तु बनाता हो, तो उसे कुंभार ” कहा गया है। क्यों??? क्योंकि वह माटी की वस्तु बनाते हैं।

    मगर उसका बेटा लोहे की वस्तु बनाता हे तो आप क्या कहोगे उसे???  कुंभार “ या लोहार ”???  या फिर मोची “??? जवाब जरूर देना.. मुझे नहीं अपने आप को। आज मोची ने मोची पकड़ रखा है, लोहार ने लोहार, धोबी ने धोबी, सब लोगों ने कुछ ना कुछ पकड़ के रखा है..

    अब वह कुंभार ने अपने को कुंभार मान ही लिया। मगर उसके बच्चे तो डॉक्टर बन गए, लेकिन अपनी मूर्खता नहीं छोड़ी, वह कुंभार शब्द पकड़े रखा और अपने नाम के पीछे कुंभार लगाते हैं। अब आप क्या कहोगे उसे ? डॉक्टर या कुंभार?? वह कुंभार नहीं है, क्योंकि माटी की वस्तु नहीं बनाता, फिर भी उस चीज को छोड़ना नहीं चाहता। क्यों?? मान्यता।

    आप जरा सोचो, रामायण महाभारत सब आपने देखी है। कुछ पढ़ी भी है, कोई भी जगह पर आपने ऐसा देखा की राम के पीछे कोई सरनेम लगी हो? जैसी आज लगती है, या पांडव कौरवों के नाम के पीछे कोई सरनेम लगी हो? नहीं लगी,

    वे उनकी मा या बाप या परदादा के नाम से जाने जाते थे। जैसे रघु राजा का रघुवंशी कहे जाते थे। वैसे ही, लेकिन वह कोई जाति नहीं है, वह उसके पुत्र है, इसलिए रघुवंशी कहे जाते थे।

    जेसे कुंतीपुत्र मतलब कुंती का पुत्र, पांडुपुत्र मतलब पांडु के पुत्र अब कोई कुंतीपुत्र को सरनेम बना ले तो वह उसकी मान्यता हे।  


    प्रश्न : कोई तर्क बुद्धि वाला यह कहेगा, की कर्ण को सूत पुत्र कहा गया, उसका क्या???

    तो उसके पिता सू थे, इसलिए उसे सू का पुत्र कहा गया। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है, की कर्ण भी सु है। इसलिए दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा बनाया और उसे अंगराज कर्ण कहा गया।

    मतलब तब ऐसी कोई भी जातिवाद नामक सरनेम नहीं थी, वह अपने वंश से पहचाने जाते थे। मतलब आज हमने यह चिजे पकड़ कर रखी है। मतलब यह खाली मान्यता ही है। और कुछ नहीं।

    मेरा यह दृढ़ कहना है, उन सबको कि आप अपने बच्चों को अपने नाम से पहचान दो, ना की जाति धर्म ज्ञाति  से, जिससे उस बच्चे में ना तो कोई हीन भावना आए, ना तो व्यर्थ में उच्च भावना ही आए।

    आप देखो पूरे पुराण, उपनिषद की इतिहास में बड़े-बड़े राजा भी विश्व के दूसरे दूर दूर के राज्य में जाकर अपनी पत्नी को पसंद करते थे। ना कि वर्ण से, यह सामान्य था।

    झांसी के राजा गंगाधर ब्राह्मण की पुत्री से विवाह किया, जैसे कि महाभारत में शांतनु महाराज ने एक मछुआरे की पुत्री से विवाह किया था, भीम ने राक्षसी की पुत्री से विवाह किया था, उस वक्त जाती वर्ण क्यों नहीं देखा?

    सीधी बात है, उस वक्त ऐसी कोई मान्यता थी ही नहीं। वरना मत्स्यगंधा के द्वारा हुए शांतनु के पुत्रो को उनका राज्य कैसे मिलता? और वह क्षत्रिय कैसे कहलाते? अगर वह हम मानते हैं, तो यह भी मानना ही पड़ेगा, की ऊंचा नीचा वर्ण जैसा कुछ है ही नहीं।

    आज तो आप भी सरकार जो करती है, चुपचाप मान लेते हो। अगर आपको लगता है, कि आप की सरकार ने जो जाती आपको दी है, वह सही है, आपके माता पिता ने जो जाति आपको दी है वह सही है, तो तो फिर आपके माता-पिता की सब बात सही ही होगी।

    तब क्या आप अपने माता पिता की सब बात मानते हो??? अगर हां तो ठीक है, अगर ना, तो फिर उन्होंने जो जाती दी हे, वह क्यों पकड़ कर रखी है? बताओ शुरुआत कौन करेगा जातिवाद निकालनेकी?? दूसरी जाति में घुसना नहीं है। ऐसा भी कई करते हैं, इससे क्या होगा समस्या बनी रहेगी।

    समझो अगर कोई बच्चा पैदा होते ही, किसी दूसरे जाति के मां-बाप के यहां बड़ा हुआ है। तो उसे तो उसके मां-बाप जो धर्म जाती दी उसे ही दृढ़ता से मानेगा। तो क्या वह सही है??

    उसको पता भी चले कि मैं इस धर्म का नहीं हूं, तो वो किस जाती का हे? उसे अपनी जाति धर्म का कैसे पता चलेगा?? क्योंकि ऐसा कुछ भगवान ने नहीं बनाया, कि तुम शक्तिशाली हो तो तुम शूद्र हो ही नहीं शकते। फिर क्या करोगे?

    प्रश्न : लेबॉरेटरी मे टेस्ट करवाओगे की इसकी जाती बताओ कोनसी हे???




    क्या हमारा इंसान होना काफी नहीं???
    हमे कोनसी दुश्मनी निकालनी हे? एक दुसरोसे??
    जिसको लड़ना हे वो किसी भी मुद्दे पर लड़ेगा,
    तो हम सब लड़ना ही चाहते हे???
    अगर दुश्मनी का अंत नहीं चाहते तो ठीक हे, लड़ो,
    मगर प्रेम चाहते हो तो आज ही भेदभाव त्यागो।
    जय हिन्द..
    वंदे मातरम..

    ‘ जागो ओर जगाओ न उल्लू बनो न बनाओ ‘ 


    आशा हे आपको यह लेख पसंद आया होगा, तो कृपा करके इसे शेर जरूर करे और दूसरों को भी जगाने मे सहायक बने। धन्यवाद।   

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