हम जात-नात और धर्म में बटे हुए हैं? | Caste system in india

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Caste system in India

हम जात-नात और धर्म में बटे हुए हैं? | Caste system in india



    प्रश्न : हम जात-नात और धर्म में बटे हुए हैं??? हम एक नहीं है इसलिए यह होता है??? कैसे???

    जवाब :
    हमारा देश जात-नात धर्म में बटा हुआ है, आप जानते ही हो लेकिन इसमें हमारी गलती है, क्योंकि हमने यह स्वीकार किया है, की हां मैं नीची जाति का हूं। या मैं ऊंची जाति का हूं। जो ऊंची जाति का है, उसे नीची जाति के समान होने में तकलीफ होती है, क्योंकि उसका अहंकार को ठेस लगती है और जो नीची जाति का है वह अपने को ऊंचा समझने को तैयार नहीं है।

    अब जब तक मरीज वेद का उपचार लेने को राजी ना हो, तो वह ठीक कैसे होगा? कुछ लघुता ग्रंथी से पीड़ित है और कुछ गुरुता ग्रंथि से पीड़ित है। अब अगर आप किसी को कहोगे भाई नीचे ऊंचा कुछ नहीं है, तो वह हम से लड़ने लगता है।


    प्रश्न : जातिवाद का जिम्मेदार कौन है????

    हमारे माता पिता और हम खुद ही इसके जिम्मेदार हैं। क्यों? कैसे?

    मेरे भगवान सीधी बात है, आपके माता-पिता ने आपको रटा रटा के सिखाया कि, तू हिंदू है , तु मुसलमान है , हम यह जाति के हैं, हम फलानी जाति के हैं ” और बार-बार यह सुनकर हम बड़े हुए, फिर यह पक्का हो गया की हां मैं फला फला जाति का ऊंचा या नीचा हु।


    प्रश्न : बच्चो को क्या सिखाना था??? तुम ही बताओ आए बड़े...

    उनको बताना चाहिए, इस पृथ्वी पर सब परमात्मा प्रकृति की संतान है। सब से प्रेम करना चाहिए, सब की मदद करनी चाहिए, जैसे हमें कोई दुख दे या मारे तो हमें पीड़ा होती हे, वैसे ही सबको पीड़ा होती है, 

    सबका अच्छा सोचना चाहिए, सब को आगे बढ़ाना चाहिए, तुम्हें महान बनना है, तुम अपने भाग्य के खुद ही विधाता हो, तुम्हें मेहनत करके अपने परिवार और जरूरयात बंद व्यक्तियों के दुख दर्द दूर करने है, देश और विश्व को एक करना हे। गुरुकुल पद्धति यही है।


    प्रश्न बच्चो को हम क्या सिखाते हैं???

    तुम्हें पढ़ना लिखना है, फिर नौकरी करनी है, अपने परिवार का पेट पालना है, अरे भाई पहले उसको खुद को तो जानने दो कि उसकी योग्यता कितनी है? उसके पहले ही आप उसे एक चीला चालू बिम्ब में डाल देते हो कि तुम्हें इतना ही करना है। इसलिए बच्चा अपना एक वाड़ा बांध लेता है और उसी के ऊपर उठता ही नहीं। चलो यह दूसरा विषय है...

    हां अबे अब तू समजाएगा... हमें कि, हमें अपने बच्चों को कैसे बड़ा करना है???
    अरे भाई.. आपकी मर्जी आप समझदार हो॥


    प्रश्न : जातिवाद के लिए जिम्मेदार है हमारी सरकार??? कैसे???

    जवाब : अरे भाई ऐसे समझो...

    देखो तुम्हारे माता-पिता ने तुम को रटाया, लेकिन सरकार ने तो तुम्हें जातिवाद का प्रमाण पत्र ही दे दिया, कि तुम फला फला जाति नाति के हो। तुम्हारे जन्म प्रमाण पत्र और अन्य सभी जगह तुमसे तुम्हारी जाति नाती पूछी जाती है, सरकार ऐसा इसलिए करती है, ताकि भविष्य में वह जब चुनाव हो तब यही नात जात के नाम से आपको बहलाए, फूसलाए, लड़ाये, मरवाये और अपनी मत बैंक मजबूत बनाएं।


    प्रश्न : जातिवाद के लिए  जिम्मेदार है हमारा समाज??? कैसे???

    जवाब :
    हमारा समाज यह समझने को तैयार ही नहीं है, की नात जात जैसी कोई चीज है ही नहीं, पहले भी नहीं थी और आज भी नहीं है। जैसे कोई गाय अपने को भेंस समझ ले फिर वह यह मान्यता छोड़ने को तैयार नहीं होती कि मैं गाय हूं। चाहे उसे जितना भी समझाओ, जैसे भेड़ो में पला बढ़ा शेर अपने को भेड़ मान लेता है, ठीक वैसे ही हमारा समाज इन झूठी मान्यताओं को छोड़ने में असमर्थ हो गया है। इसके बारे में मैं अलग से चर्चा करूंग...


    प्रश्न : जातिवाद के लिए जिम्मेदार है हमारी शिक्षण पद्धति??? कैसे???

    जवाब :
    हमारी शिक्षण पद्धति मेकॉले की पद्धति है। जिसमें बच्चों को अंग्रेजी पढ़ा कर क्लर्क बनाना था। लेकिन आज भी हम उस अंग्रेजी पद्धति को अपनाए हुए हैं, जिसमें बच्चे को अनेक भाषाएं गलत शलत अंग्रेजों के इतिहास पढ़ाए जाते हैं। जिससे वह अपने को गुलाम मान लेता है, उसे नौकरी के लिए ही तैयार किया जाता है, ऐसी शिक्षा पद्धति व्यक्ति लक्षी कैसे हो सकती हे? इस पर में अलग चर्चा करूंगा...

    अंग्रेजी शिक्षा पद्धति भी, हमारे बच्चों को वह जो है उसकी सही शिक्षा नहीं देती।

    ***


    जैसे मेरेथोन रेस में एक दौड़वीर दूसरे को मशाल पकड़ा देता है,
    वैसे ही हम भी हमारे बच्चों को यह जाति नाती की मान्यता रूपी मशाल पकडाते जा रहे हैं,
    हमारे माता-पिता तो स्वर्गवासी हो गए लेकिन हमको यह मशाल पकडाते गए।
     और कहेते गए
    “ पकड़े रहेना.. छोड़ना नहीं॥ “
    ( यह फैविकोल की मजबूत जोड़ हे तुटेगी पर छूटेगी नहीं )
    मेरे भाइयो तुटने से अच्छा छूटना हे।



    प्रश्न : जातिवाद पर मेरा विश्लेषण???

    जवाब :
    मुझे समझ में नहीं आता.. लोग क्यों समझ नहीं पाते? कि हमारे शास्त्रों में ऊंच-नीच जैसा कोई शब्द है ही नहीं। फिर भी खुद को नीचा-ऊंचा समझना छोड़ते नहीं। यह एक मान्यता के अलावा और कुछ भी नहीं है।

    देखो मैं आप से कहता हूं कि, मैं आपको बहुत सारी जमीन खेती करने को देता हूं, आप अपने दोनों पैर मुझे काट कर दे दो आप दोगे? नहीं?

    अच्छा आप से कहता हूं कि, मैं आपके घर में बहुत सारा अनाज भर दूंगा जो कभी भी खत्म ना हो, पर आप अपना पेट काटकर मुझे दे दो, आप दोगे?  नहीं?

    अच्छा मैं आपको सोने-चांदी, हीरे-मोती दूंगा, आप अपनी छाती और हाथ काट कर दे दो, आप दोगे? नहीं?

    चलो मैं पूरे विश्व में करोड़ों की संपत्ति और आपका नाम का डंका बजा दूंगा, महल दूंगा, सन्मान करूंगा आप अपना सर काट के दे दो, क्या आप दोगे? नहीं?

    अरे भाई आपके पैर गंदे हे, काट के फेक दो, आपके हाथों में ताकत नहीं है, काट कर फेंक दो, आपका पेट गुब्बारा हो गया है, काट दो, आप कितने बदसूरत है, सर का क्या करोगे? काट दो। काटोगे? नहीं?

    तो फिर आप अपनी झूठी मान्यता के पीछे, अपने ही बच्चों के हाथ पैर क्यों काट रहे हो? नहीं समझे??? समझाता हु..

    समझो कई लोग मुझे कहते हैं, यार मैं तो नीची जाति का हु क्योंकि भगवान ने कहा है, मैं क्षुद्र हूं। हमें भगवान का पैर क्यों बनाया??

    वह लोग यह नहीं समझते कि, भगवान की पूजा सबसे पहले उनके पैरों से ही शुरू होती है, ना कि मस्तक से तो सबसे पहले भगवान के लिए अधिक से अधिक प्रिय क्षुद्र है, क्योंकि उनके गुण मैंने आगे कहा वैसे हे।
    इसलिए वह उनके लिए प्रथम है।

    उसके बाद पेट यानी वैश्य, हाथ यानी क्षत्रिय और आखिर में सर यानी ब्राह्मण आते हे। तो फिर उसमें बुरा क्या है? सबसे प्रथम कौन हुआ? भगवान को पता है सबसे ज्यादा जरूरत इसको हे, इसलिए उसे पहले रखा।

    देखो भाई.. अगर चलेंगे नहीं तो शरीर स्वस्थ नहीं रहेगा, अगर पैर चल के खेत में नहीं जाएंगे तो खेती नहीं होगी, अगर पैर युद्ध के मैदान में नहीं जाएंगे, तो रक्षा नहीं होगी, अगर पेर चलकर गुरुकुल नहीं जाएंगे तो ज्ञान प्राप्त नहीं होगा।
    पेर के ऊपर खड़े होंगे तभी बाकी सब कार्य होंगे। सबसे पूजनीय और प्रथम पेर यानी शूद्र है, ना की मस्तक यानी ब्राह्मण।

    यहां मेरा मतलब क्षुद्र गुण वाले व्यक्तियों से है। ना कि क्षुद्र के घर जन्मे व्यक्ति से..... मतलब की भगवान क्षुद्र गुण वाले व्यक्ति के प्रति अति दयालु है। इसलिए उनको प्रथम स्थान दिया है, तो यहां अपनी जाति नाती न जोड़े।

    प्यारे मित्रो.. जब कोई व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) अपने घर की, गांव की, देश की, या तो अपने बच्चों की मां बनकर गंदगी को साफ करता है, तो वह क्षुद्र है। जब वह अपने परिवार देश के लिए, व्यापार खेती करता है और खाना बनाकर खिलाता है तो वह वैश्य है।

    जब व्यक्ति अपने परिवार देश के दुश्मनों से बचाने के लिए अपनी जान पर खेल जाता है, लड़ता है तब वह क्षत्रिय और जब वह अपने देश परिवार को चरित्रवान, वीरवान, साहस और परमात्मा का ज्ञान देकर उसे मुक्त करने के लिए स्वयं ज्ञान लेता है और दूसरों को भी उस ज्ञान पर चलने के लिए प्रेरित करता हे तो वह ब्राह्मण है।

    निष्कर्ष : अगर अभी भी आपके समझ में कुछ नहीं आता तो फिर आप खुद ही अपने हाथों अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हो।

    मेरी सोच : अगर इस देश में जातिवाद मत खत्म करना है तो, शिक्षण नीति बदलो, माता पिता को अपनी सोच सही करनी होगी और देश के नागरिकों को अपने नात जात के नाम त्याग कर कुंभार, लोहार, धोबी की जगह भारतीय शब्द लगाना होगा।

    जैसे प्रधानमंत्री जी ने अंग की त्रुटि वालों को दिव्यांग “ नाम से सम्मानित किया है। वैसे ही सब लोगों को अपने नाम के पीछे भारतीय लगाना होगा, तब ही इस देश में एकता आएगी, सब एक बनेंगे, तब तक यह कदापि संभव नहीं हे।

    अपने नाम के आगे अपनी माँ का नाम, फिर पिता का नाम, फिर अपना नाम लिखना चाहिए। तभी यह देश सही तरीके से जातिवादी संकेतो से दूर होगा।


    ***

    त्याग देंगे देह मगर, मान्यता नहीं त्यागेंगे।
    भले सिने मे जलती रहे नफरत की आग, मगर सच्चाई नहीं जानेंगे।
    वो ओर होंगे जो बातो से मान जाते हे,
    हम हर बात को उलट देंगे, मगर ईश्वर की बात नहीं मानेंगे।


    ‘ जागो ओर जगाओ न उल्लू बनो न बनाओ ‘ 


    आशा हे आपको यह लेख पसंद आया होगा, तो कृपा करके इसे शेर जरूर करे और दूसरों को भी जगाने मे सहायक बने। धन्यवाद।  

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